बावला बचपन

वो बचपन वो खेल , वो गली-मोहल्ले की यादें ।
मैं खो जाता हूँ अक्सर, जो याद करता हूँ वो बातें  ।।

जो खोलता हूंँ कभी, दशकों से बंद खिलौनों की अलमारी ।
एक बचपना उमड़ आता है सहसा, लगी जैसे कोई चिंगारी ।।

और जब संदूक से निकलते हैं, दो हाथ के कपड़े मेरे ।
तब याद आते हैं, वो हर रोज इधर-उधर खिलखिलाते सवेरे ।।

अक्सर जब मिलता हूंँ खुद से, बचपन की तस्वीरों में ।
एक रंगीनियत समाती है अंदर, जैसे कोहिनूर हीरों में  ।।

वो मकां की छत, वो सीढ़ियों की उछल कूद ।
वो धूप में बेवजह घूमना,वो बारिश की बूंद ।।

वो उछलते गिल्ली-डंडे, वो कंचे की गोली ।

पहुंचना लेकर घर, गंदे कपड़े और सूरत

भोली ।।


वो कागज की कश्ती, वो पुराने टायर संग मस्ती ।
वो बूढ़े पीपल का झूला, मैं कितना कुछ भूला ।।

मैं  कितना कुछ भूला , मैं कितना कुछ भूला.......

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